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गुलज़ार साहब की शायरी सादगी में गहराई और खामोशी में भावना ढूँढ लेती है। gulzar shayari प्यार, दर्द, रिश्तों और ज़िंदगी की सच्चाइयों को ऐसे अल्फ़ाज़ देती है, जो सीधे दिल को छू जाते हैं और लंबे समय तक एहसास बनकर साथ रहते हैं।

उनकी शायरी में शोर नहीं होता, बल्कि एक शांत गहराई होती है जो पाठक को खुद से जोड़ देती है। यह कलेक्शन गुलज़ार साहब की उन चुनिंदा शायरियों का भाव प्रस्तुत करता है, जहाँ कम शब्दों में ज़िंदगी, मोहब्बत और तन्हाई की सबसे बड़ी सच्चाइयाँ सामने आती हैं।

इश्क़ की तलाश में
क्यों निकलते हो तुम,
इश्क़ खुद तलाश लेता है
जिसे बर्बाद करना होता है।

तुझ से बिछड़ कर
कब ये हुआ कि मर गए,
तेरे दिन भी गुजर गए
और मेरे दिन भी गुजर गए.

आऊं तो सुबह,
जाऊं तो मेरा नाम शबा लिखना,
बर्फ पड़े तो
बर्फ पे मेरा नाम दुआ लिखना

वो शख़्स जो कभी
मेरा था ही नही,
उसने मुझे किसी और का भी
नही होने दिया.

सालों बाद मिले वो
गले लगाकर रोने लगे,
जाते वक्त जिसने कहा था
तुम्हारे जैसे हज़ार मिलेंगे.

जब भी आंखों में अश्क भर आए
लोग कुछ डूबते नजर आए
चांद जितने भी गुम हुए शब के
सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए

जिन दिनों आप रहते थे,
आंख में धूप रहती थी
अब तो जाले ही जाले हैं,
ये भी जाने ही वाले हैं.

जबसे तुम्हारे नाम की
मिसरी होंठ लगाई है
मीठा सा गम है,
और मीठी सी तन्हाई है.

वक्त कटता भी नही
वक्त रुकता भी नही
दिल है सजदे में मगर
इश्क झुकता भी नही

एक बार जब तुमको बरसते पानियों के पार देखा था
यूँ लगा था जैसे गुनगुनाता एक आबशार देखा था
तब से मेरी नींद में बसती रहती हो
बोलती बहुत हो और हँसती रहती हो.

 

 

 

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